आसनसोल : आसनसोल की राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ही नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है—डॉ. सत्यब्रत चटर्जी। पेशे से होम्योपैथिक डॉक्टर होने का दावा करने वाले और खुद को ‘द मिशन हॉस्पिटल’ का डॉक्टर बताकर रोब झाड़ने वाले डॉ. चटर्जी अब सिर्फ घरेलू विवाद या जमीन धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि उन पर राजनीतिक दलों की आड़ में अवैध वसूली और सिंडिकेट चलाने के गंभीर और बड़े आरोप लग रहे हैं।
आम जनता की आवाज़ और सोशल मीडिया पर गूंज रही चर्चाओं के मुताबिक, यह पूरा मामला अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक षड्यंत्र का रूप ले चुका है।
तृणमूल के शासनकाल से लेकर भगवा खेमे तक: तस्वीरों का खेल
सूत्रों और जनता के बीच चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल में यही डॉ. सत्यब्रत चटर्जी सत्ताधारी दल के कई बड़े मंत्रियों और पार्षदों के साथ घूम-घूमकर तस्वीरें खिंचवाते थे। आरोप है कि इसी राजनीतिक धौंस के बल पर उन्होंने अवैध वसूली से लेकर सिंडिकेट राज तक का काला कारोबार चलाया।
लेकिन जैसे ही हवा का रुख बदला, डॉक्टर साहब ने अपनी रणनीति भी बदल ली। आज वही शख्स आसनसोल दक्षिण की विधायक अग्निमित्र पाल के साथ अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करवाकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मुखौटा पहनने और खुद को भाजपाई साबित करने की फिराक में जुटा है।
किसके इशारे पर पार्टी में एंट्री? उठ रहे बड़े सवाल
आसनसोल की जनता और राजनीतिक गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है कि—आखिर ऐसे दागदार और विवादित शख्स को भारतीय जनता पार्टी की चौखट तक लाने और शामिल कराने के पीछे किसका हाथ है? कानून के पन्नों में गंभीर धाराओं के तहत आरोपी बनाए गए और अपनी ही पत्नी व मासूम बच्चों को घर से बेदखल करने वाले इस व्यक्ति को किसके बल पर राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है? यह सवाल आज हर आम नागरिक की जुबान पर है।
कानून के शिकंजे में क्यों फंसे डॉक्टर साहब?
जमीन से जुड़े धोखाधड़ी के मामले: सहयोगी नगर के निवासी और रॉय पारा स्थित पंचनती अपार्टमेंट के पते से जुड़े इस परिवार पर जमीन के फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी के संगीन आरोप हैं, जिनमें उनके माता-पिता और भाई के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज है।
घरेलू हिंसा और बेघर करने का आरोप: हाल ही में उन पर धारा 498A (घरेलू हिंसा) के तहत मामला दर्ज हुआ है। आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
आम जनता का सवाल: क्या राजनीति अपराधियों की शरणस्थली बन गई है?
यह सिर्फ किसी एक अखबार या चैनल की खबर नहीं है, बल्कि आसनसोल के आम लोगों की वह सुलगती हुई आवाज़ है जो पूछ रही है कि आखिर कब तक ऐसे सफेदपोश चेहरे कानून की आंखों में धूल झोंककर राजनीतिक दलों का दामन ओढ़ कर बचते रहेंगे?








