सत्ता बदली, राजनेता बदले… लेकिन नहीं बदला ‘दादा कल्चर’

आसनसोल: पश्चिम बंगाल के इस औद्योगिक और कोयलांचल अंचल में अगर कोई एक शब्द पिछले चार-पाँच दशकों से सबसे ज़्यादा प्रासंगिक, शक्तिशाली और असरदार रहा है, तो वह है—‘दादा’।

आसनसोल के किसी भी कोने में चले जाइए, चाहे कोई निर्माण कार्य शुरू कराना हो, कोयला या स्क्रैप का कारोबार हो, ज़मीन की खरीद-बिक्री हो या फिर प्रशासनिक स्तर पर कोई अटका हुआ काम… हर जगह एक ही जुमला सुनने को मिलता है—”दादा से बात करनी होगी, दादा को बोल दिए हैं।” राजनीतिक दौर बदले, झंडे के रंग बदले, सरकारें आईं और गईं, लेकिन आसनसोल की फिज़ाओं में फैला यह ‘दादा कल्चर’ जस का तस बना हुआ है।

तृणमूल काल से लेकर भाजपा के दौर तक… दादा का रुतबा बरकरार

स्थानीय लोगों और विश्लेषकों का कहना है कि वामपंथी शासन के दौरान जब किसी इलाके में हलचल होती थी, तो कहा जाता था—”दादा आ रहे हैं।” तृणमूल के शासनकाल में जब परिस्थितियां बदलती थीं, तो चर्चा होती थी—”दादा निकल गए हैं।” और अब, जब क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा बढ़ा और राजनीतिक समीकरण बदले, तब भी आम जनता और व्यापारियों की ज़ुबान पर वही शब्द है—”दादा से बात हो गई है।”

सवाल यह उठता है कि सत्ता के इतने बड़े-बड़े बदलावों के बावजूद आखिर आसनसोल में ‘दादा’ के बिना पत्ता क्यों नहीं हिलता? आखिर क्या वजह है कि हर दौर में इस नाम के इर्द-गिर्द पावर सेंट्रिक (सत्ता केंद्रित) राजनीति घूमती रहती है?

दादा के नाम पर चढ़ावा और करोड़ों का खेल!

सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं की मानें तो इस ‘दादा संस्कृति’ का सबसे स्याह पहलू है इसके आड़ में होने वाला आर्थिक खेल।

अवैध उगाही (सिंडिकेट): आरोप हैं कि इलाके में चल रहे कई अवैध कारोबारों से लेकर वैध ठेकेदारी तक, हर जगह ‘दादा के नाम पर’ पैसे की उगाही होती है।

चढ़ावा और कटमनी: कोई भी नया काम शुरू करने से पहले ‘दादा का चढ़ावा’ चढ़ाना एक अघोषित नियम बन चुका है।

करोड़ों का कारोबार: इस नाम का इस्तेमाल करके हर महीने करोड़ों रुपये का लेन-देन और कटमनी का खेल खेला जाता है, जिसकी आँच आम जनता की जेब तक पहुँचती है।

आखिर कब तक चलेगा ‘दादा’ का यह सिलसिला?

आसनसोल की आम जनता अब यह सवाल पूछने लगी है कि कानून और प्रशासन के ऊपर यह ‘दादा सिस्टम’ कब तक हावी रहेगा? क्या आसनसोल के विकास और पारदर्शी व्यवस्था के बीच यह ‘दादा कल्चर’ सबसे बड़ी रुकावट नहीं है?

राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो खूब लगाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि जो भी सत्ता में आता है, वह इस ‘दादा व्यवस्था’ को खत्म करने के बजाय इसे अपने तरीके से चलाने लगता है। अब देखना यह होगा कि क्या आसनसोल कभी इस छाया-साम्राज्य से बाहर निकल पाएगा या फिर आने वाले दिनों में भी यहाँ हर काम से पहले यही गूंजता रहेगा—”दादा से पूछना पड़ेगा!”

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