ईसीएल की ज़मीन पर दलाली और सिंडिकेट का खेल: काले कोट की आड़ में भू-माफियाओं का पर्दाफाश

आसनसोल: न्याय के मंदिर में काले कोट पहनकर लोगों को इंसाफ दिलाने वाले कुछ नुमाइंदे ही आज खुद कानून और न्याय की धज्जियां उड़ा रहे हैं। आसनसोल और उसके आसपास के इलाकों में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) की ज़मीनों पर अवैध कब्जों और उनकी खरीद-फरोख्त का एक ऐसा काला खेल चल रहा है, जो प्रशासन और कानून व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

1979 में ही ईसीएल के नाम हो चुकी है ज़मीन

प्राप्त जानकारी और पुराने अभिलेखों के अनुसार, विवादित ज़मीन मूल रूप से 1979 में ही तत्कालीन मालिकों द्वारा ईसीएल को बेच दी गई थी। इसके बावजूद, आज कुछ तथाकथित भू-माफिया और कानूनी पेशे से जुड़े लोग इस सरकारी संपत्ति को अपनी निजी जागीर समझकर धड़ल्ले से बेच रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों का काम समाज को न्याय दिलाना और कानून की रक्षा करना है, वही आज सिंडिकेट चलाकर आम जनता को ठगने का काम कर रहे हैं।

नियामतपुर से संचालित हो रहा है दलाली का नेटवर्क

इस पूरे अवैध कारोबार की जड़ें नियामतपुर से जुड़ी बताई जा रही हैं। नियामतपुर से आने वाले कुछ दलाल और तथाकथित ‘नमूने’ ईसीएल के दफ्तरों में साठगांठ कर और अधिकारियों के इर्द-गिर्द रहकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ये लोग बड़े पूंजीपतियों और निवेशकों को अपने जाल में फंसाकर ईसीएल की ज़मीनों की अवैध प्लॉटिंग कर रहे हैं और भोले-भाले लोगों को झूठे सपने दिखाकर उनकी गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं।

बदल गई सरकार, पर नहीं बदली नीतियां

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में स्थानीय पार्षदों और रसूखदार लोगों के साथ मिलकर मालामाल होने वाले ये सिंडिकेटजीवी आज सत्ता परिवर्तन के बाद भी सुरक्षित हैं। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के उभार और राजनीतिक बदलाव के बावजूद इस सिंडिकेट पर कोई ठोस कार्रवाई न होना कई बड़े सवाल खड़े करता है। जानकारों का कहना है कि सरकारें भले ही बदल गई हों, लेकिन ज़मीन के इस अवैध खेल में शामिल लोगों की नीयत और सरपरस्ती आज भी जस की तस बनी हुई है।

ईसीएल प्रबंधन का कड़ा रुख और कागजातों का खेल

जब इस मामले को लेकर ईसीएल प्रबंधन से संपर्क किया गया, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि— “यह ज़मीन पूरी तरह से हमारी (ईसीएल) है और इसे केवल म्यूटेशन (नामंत्रण) या विशेष उपयोग के लिए दिया गया था, बेचने के लिए नहीं।”

इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर ज़मीन पर अवैध कब्जा कैसे हो रहा है, यह जांच का विषय है। यदि राज्य पुलिस और ईसीएल प्रबंधन मिलकर निष्पक्ष जांच करें, तो इन दलालों और तथाकथित भू-माफियाओं के ठिकानों से ऐसे सनसनीखेज दस्तावेज बरामद हो सकते हैं, जो ईसीएल की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक सुस्ती की पोल खोलकर रख देंगे।

सवाल बड़ा है: क्या न्याय के प्रतीक माने जाने वाले काले कोट की आड़ में चल रहा यह अवैध साम्राज्य यूं ही फलता-फूलता रहेगा, या प्रशासन इन भू-माफियाओं पर नकेल कसने की हिम्मत जुटाएगा?

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